मनकबत ख्वाजा गरीब नवाज़ रदिअल्लाहो तआला अन्हो। बहरे ज़ुल्मत में तुम एक जज़ीरा ख्वाजा, बीच मंझधार में तुम एक किनारा ख्वाजा। मैंने मीरास में पायी है ग़ुलामी आक़ा, तीस पुश्तों से मैं नौकर हूँ तुम्हारा ख्वाजा। वालिये हिन्द यहाँ हिन्द में मुश्किल हैं बहुत, फ़ज़ले रब्बी से हो तुम मेरा सहारा ख्वाजा। न कोई पहले से मनसूबा न दावत कोई, तुमने अजमेर मुझे खूब बुलाया ख्वाजा। हिन्द में आप हैं सौगात-ए-रसूल-ए-अरबी, हर तरफ अबरे करम आपका छाया ख्वाजा। आरजू है के मैं फिर चाँद रजब का देखूँ, फिर बुलाने का करूँ तुमसे तक़ाज़ा ख्वाजा। अशरफ़ क़ादरी बेजोड़ है बेज़ोम नहीं, ग़ौस का हूँ तो तुम्हारा हूँ तुम्हारा ख्वाजा। ( सरकार शरफ़-ए-मिल्लत अश्शाह अशरफ़ मियाँ क़ादरी बरकाती मारहरा शरीफ़ )
🌴🌹वली_की_तस्बीह🌹🌴 पीर मेहर अली शाह رحمت ہ اللہ علیہ गोलड़ा के प्लेटफार्म पर बैठे हुए थे वहीं प्लेटफार्म पर एक अंग्रेज़ अफसर भी अपनी ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था उसने दूर से देखा कि एक फक़ीर बैठा है फटी हुई गुदड़ी बगल में मुसल्ला हाथ में तस्बीह है उसे जुस्तजू हुई और कुछ टाइम पास की नियत से हज़रत मेहर अली शाह की तरफ बढ़ा और पास जाकर उनकी तस्बीह की तरफ इशारा करके बोला: बाबा ये क्या है? पीर मेहर अली शाह رحمتہ اللہ علیہ ने नज़र उठा कर देखा एक अंग्रेज़ अफसर कांधे पर बंदूक लिए खड़ा है पीर मेहर अली शाह ने उस अंग्रेज़ की बंदूक की तरफ इशारा करके पूछा: ये क्या है? उस अंग्रेज़ ने कहा : ये मेरा हथियार है ! पीर मेहर अली शाह ने कहा : ये मेरा हथियार है ! वो अंग्रेज़ खामोश हो गया फिर थोड़ी देर के बाद सवाल करता है बाबा ये तुम्हे किसने दिया? पीर मेहर अली शाह ने फ़रमाया : ये तुझे किसने दिया? वो अंग्रेज़ बोला: ये मुझे मेरे सीनियर ऑफिसर ने दिया है मेरे बॉस ने दिया है ! पीर मेहर अली शाह ने फ़रमाया : ये मुझे मेरे बॉस ने दिया है मेरे ग़ौसे आज़म ने...